अगर मैं एक मोर
होता
तो जब भी यह
आसमान
रोता
मैं अपने पंख
लहरा
कर
सुनहरे रंगो का
ताज
बना
कर
नाच उठता खिलखिला
कर
अपने मस्त पैरो
को
हिला
कर
झूम-झूम कर बयां
करता
इस धरती की
सुंदरता
परे रहता पढ़ाई
से
रोज़ की भागम-भागी
से
वन में रहता
घुमता
और ज़िन्दगी के
मज़े
चूमता
खाने में ज़रूर
झिजकता
स्कूल और घर को
मिस
भी
करता
खिलौनों की मुझे
याद
सताती
वैनिला आइस-क्रीम
भी
बहुत
याद
आती
तो शायद मैं
ऐसे
ही
ठीक
हूँ
बेहतर है अभी मैं
ऐसा
ही
रहू
बाद की बात देखी
जाएगी
तब भी अगर ये
इच्छा
मुझे
भाएगी
तो मैं भागवान
से
पूछुंगा
उनसे गुज़ारिश करूंगा
की मुझे मोर
बना
दे
रंग बिरंगे पंख दिला दे
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